इस हिस्से में अल्लामा इकबाल मरहूम का वो उर्दू कलाम मीन दर्ज है जो उन्होंने 1925 ईस्वी से लेकर अपनी वफात से कुछ दिनों पहले तक मौजू किया। इस हिस्से में कोई ग़ज़ल नहीं है और ना किसी नज्म में रंगे तकजील पाया जाता है। कलामे इकबाल का मुतालाह करने से माल...
इस हिस्से में अल्लामा इकबाल मरहूम का वो उर्दू कलाम मीन दर्ज है जो उन्होंने 1925 ईस्वी से लेकर अपनी वफात से कुछ दिनों पहले तक मौजू किया। इस हिस्से में कोई ग़ज़ल नहीं है और ना किसी नज्म में रंगे तकजील पाया जाता है। कलामे इकबाल का मुतालाह करने से मालूम होता है के गजलों का दौर 1894 ईस्वी से शुरू होकर 1934 ईस्वी में खत्म हो गया। चुनांचे जर्बे कलीम में तकजील और शेरीयत बहुत कम है ये इन्क़लाब इस हकीकत पर दलील है के जिंदगी के आखिरी दौर में इकबाल की शायरी पर फलसफा गालिब आ गया है। इस हिस्से में दो नज्में फारसी जुबान में है। मरहूम ने उन्हें उर्दू हिस्से में इसलिए शामिल किया के अरमगाने हिजाज (हिस्सा फारसी) में शामिल नहीं हो सकती थी। इस हिस्से के अजजा ए तरकीबी हस्बे जेल है। 1- शुरू में 8 नज्में हैं और इस नज्मो में 6 तमसीली है इसलिए ये मालूम होता है के अगर इकबाल मरहूम चंद साल और जिंदा रह जाते तो वो मिल्टन (MILTON) की तरह खालीस तमसिली शायरी इख्तियार कर लेते। 2- इसके बाद 13 रूबाईयात है जिनमें से बाज में वहदत उल वजूद का रंग पाया जाता है। 3- इन के बाद में मुल्ला जादाह जैगम लौलाबी है इस में 17 नज्में है और 2 शेर हैं। 4- आखिर में तीन मुतफर्रीक नज्में है जिनमें से दो नज्में 2 अशखास के नाम है और आखरी नज्म में हजरत ए इंसान की मनसब और मकाम को वाजे किया है। इस मुख्तसर मुकदमे के बाद किताब शुरू करता हूं।